सुपर चीफ (अमेरिका):

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विवरण व खूबियां: वर्ष 2004 में लाहौल स्पीति में सबसे पहले लगाई गई इस अमेरिकी किस्म का अब अच्छा रिस्पांस देखने को मिला है। लाहौल स्पीति से लेकर किन्नौर, शिमला, कुल्लू, मंडी आदि जिलों में सुपर चीफ उगाया जा रहा है। इसके उत्पादन का रिकार्ड भी बेहतर है और देश की विभिन्न सेब मंडियों में कारोबारियों ने भी इसे हाथों-हाथ लिया है। इस किस्म के फल का आकार लंबा, रंग गहरा लाल और स्वाद भी बेहतर है। इसकी शैल लाइफ काफी उम्दा है। इस किस्म का फल पौधे पर काफी समय तक बिना खराब हुए टिका रहता है। बागवान इसे मार्किट की मंदी या उछाल के हिसाब से अपनी सुविधा के अनुसार तोड़ सकते हैं। यह किस्म 4500 से 8000 फीट की ऊंचाई वाले इलाकों में सफल है।
खामियां: सुपर चीफ की अमेरिकी किस्म में शुरुआती एक-दो साल में ग्रोथ काफी अच्छी पाई गई है। लेकिन तीसरे साल इसके पौधे की ग्रोथ प्रभावित होने लगती है। इससे पौधे का विकास रुक जाता है। अधिक बीमे फटने के कारण फल का आकार छोटा रह जाता है। जिन इलाकों में अमूमन यूं भी अन्य किस्मों की ग्रोथ कम होती है, वहां सुपर चीफ कामयाब नहीं है। अगर बागीचों में डायरेक्ट ही सुपर चीफ का पौधा लगाया जाए तो इसकी ग्रोथ रेट बहुत कम पाई गई है। अगर पौधे की ग्रोथ रुक जाए तो पौधे की स्किन पर पेपरीवार का अटैक हो जाता है। यदि पेपरीवार का प्रबंधन न किया जाए तो पौधा ही नष्ट हो जाता है।

सावधानी: सुपर चीफ किस्म के पौधे लगाने में मुख्य रूप से बागवानों को रूट स्टॉक को दो साल तक इंतजार करने के बाद पौधे को ग्राफ्ट करना चाहिए। उसके बाद पौधे के विकास के लिए बीमों की छंटाई अधिक करनी चाहिए। इससे पौधे का घेरा बढ़ेगा। यदि सुपर चीफ किस्म में प्रूनिंग की सही तकनीक अपनाई जाए तो पांच से छह साल के भीतर इसका एक पौधा तीन से चार पेटी सेब पैदा करने में सक्षम है।

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