हाईकोर्ट में सरकार को फिर फटकार, क्यों बरती जा रही वन भूमि पर अवैध कब्जा करने वालों के खिलाफ कार्रवाई में कोताही

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हाईकोर्ट में सरकार को फिर फटकार, क्यों बरती जा रही वन भूमि पर अवैध
कब्जा करने वालों के खिलाफ कार्रवाई में कोताही
सख्ती दिखाते हुए हाईकोर्ट ने प्रधान अरण्यपाल को किया 22 नवंबर को तलब
शिमला। हिमाचल प्रदेश में सरकारी वन भूमि से पेड़ काटकर सेब के अवैध
बागीचे तैयार करने वालों के खिलाफ पुख्ता कार्रवाई न होने पर हाईकोर्ट ने
सख्ती दिखाई है। सरकारी अमले की तरफ से कब्जे हटाने में बरती जा रही
कोताही से नाराज हाईकोर्ट ने न केवल राजस्व सचिव से पूरी रिपोर्ट मांगी
है, बल्कि पीसीसीएफ (प्रिंसिपल चीफ कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट) को भी 22 नवंबर
को अदालत में तलब किया है। हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति
मंसूर अहमद मीर व न्यायमूर्ति तरलोक सिंह चौहान की खंडपीठ ने अवैध कब्जों
से जुड़े मामलों की सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किए हैं। यहां बता दें
कि हाईकोर्ट ने सरकार को वन भूमि पर पेड़ काटकर विकसित किए गए सेब
बागीचों को हटाने का निर्देश जारी किया हुआ है। प्रदेश हाईकोर्ट ने इस
संदर्भ में ऊपरी शिमला के चैंथला गांव के कुछ लोगों के पत्र पर संज्ञान
लेते हुए सरकार को वन भूमि को कब्जा मुक्त करने के आदेश जारी किए थे।
सरकार की तरफ से वन भूमि पर अवैध कब्जों के मामले में वन विभाग ने शपथ
पत्र के माध्यम से अदालत को बताया कि प्रदेश भर में अवैध कब्जों के कुल
10307 मामले सामने आए। इनमें से 8912 का निपटारा किया गया है। निपटाए गए
मामलों में से 5143 से अवैध कब्जे हटाए जा चुके हैं। सबसे ज्यादा अवैध
कब्जों के मामले शिमला जिला में पाए गए हैं। शिमला जिला में 3057 मामले
सामने आए। कुल्लू जिला में ऐसे मामलों की संख्या 2388 पाई गई। वन विभाग
ने अपने शपथ पत्र में बताया कि कुल्लू के 130 और शिमला के 1929 अवैध
कब्जों के मामलों को जल्दी ही निपटाया जाएगा। अदालत को यह भी बताया गया
था कि शिमला जिला के रोहडू इलाके में 1481 केसों में दस बीघा से कम वन
भूमि पर अवैध कब्काा किया गया है और 418 मामलो में दस बीघा से अधिक भूमि
पर अवैध कब्काा पाया गया है। इस पर हाईकोर्ट ने डीएफओ रोहडू को आदेश दिए
थे कि वह इन सभी मामलों का निपटारा चार सप्ताह के भीतर करें। अदालत ने
अपने आदेशो की अक्षरश: अनुपालना के लिए मुख्य अरण्यपाल को जिम्मेवार
ठहराया है। अदालत ने पिछले आदेश में साफ किया था कि यदि इन आदेशों का
अक्षरश: पालन न किया गया तो दोषियों पर अवमानना का मामला चलाया जाएगा।

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