लो हाइट में स्कारलेट की कमी को इटली की नॉन स्पर वैरायटी जेरोमाइन पूरा करने में सक्षम

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वर्ष 2013 के दिसंबर माह में कोटखाई, जुब्बल व कोटगढ़ के कुछ बागवानों ने इटली की ग्रीबा नर्सरी से रेड विलॉक्स, जेरोमाइन, रेडलम गाला, एजटेक फ्यूजी, बुकाय गाला, फ्यूजी किकू, ब्रुकफील्ड गाला, ग्रेनीस्मिथ चैलेंजर जैसी नॉन स्पर किस्मों को मंगवाया। डेढ़ साल तक इन नॉन स्पर किस्मों की ग्रोथ आदि को गहराई से परखने के बाद बागवानों को उम्मीद जगी कि कामयाबी जरूर मिलेगी। उनकी यह उम्मीद पूरी भी हुई। पांच-छह बागवानों के बागीचों में आए सैंपल ने यह उम्मीद जगाी है कि रेड विलॉक्स किस्म ऊंचाई वाले इलाकों के लिए मोस्ट सुटेबल वैरायटी साबित होगी। नॉन स्पर किस्मों के पौधों की ग्रोथ रेट स्पर किस्मों से कहीं अधिक है। इटली की जेरोमाइन किस्म स्कारलेट स्पर का विकल्प साबित होगी। कारण यह है कि प्रदेश के कई इलाकों में स्कारलेट स्पर किस्म के सेब में रस्टिंग की दिक्कत पेश आ रही है। जिन बागीचों की भूमि चिकनी और सख्त है, वहां रस्टिंग की समस्या सबसे अधिक पाई जा रही है। स्कारलेट स्पर किस्म के चार साल पहले आए सैंपल में मौजूद रस्टिंग अब फल में आ रही है। इसका कोई सार्थक हल नहीं निकला है। ऐसे में कई बागवानों का इस किस्म से मोह भंग होने लगा है। इन परिस्थितियों में लो हाइट में स्कारलेट की कमी को इटली की नॉन स्पर वैरायटी जेरोमाइन पूरा करने में सक्षम होगी। बागवानों के अनुभव बता रहे हैं कि इसके साथ ही रेडलम गाला भी यूएसए की सेल्फ पोलीनाइजर वैरायटी गेल गाला को रिप्लेस करने में कामयाब होगा। गेल गाला में अभी यह शिकायत पेश आ रही है कि उसके फल का आकार छोटा है। इसके मुकाबले रेडलम गाला का कलर भी बेहतर है और आकार भी। अमेरिकी पोलीनेटर वैरायटी ग्रेनी स्मिथ भी विगत सात साल से हिमाचल प्रदेश में प्रचलित है। काफी संख्या में बागवानों ने इसे अपनाया। इस किस्म का सेब विश्व का सबसे अधिक लोकप्रिय है। यह बिना स्टोरेज सुविधा के भी अपना अस्तित्व बरकरार रखता है। हिमाचल में अप्रैल माह में भी यह सेब बाजार में उपलब्ध है। मार्च से लेकर जून तक ग्रेनी स्मिथ किस्म का सेब भारत के महानगरों में खूब बिकता है। इस वैरायटी को इटली की ग्रेनीस्मिथ चैलेंजर से चैलेंज मिला है। इटली की वैरायटी ग्रेनीस्मिथ चैलेंजर अमेरिकी वैरायटी ग्रेनी स्मिथ से बेहतर साबित हो रही है। ग्रेनीस्मिथ चैलेंजर सेब का रंग गहरा हरा है। फल में व्हाइट स्पॉट इस किस्म की खासियत है। इसकी ग्रोथ की प्रवृति भी उत्साहवर्धक है। कलम लगाने के दूसरे साल ही यह किस्म फल देने लगती है। इस वैरायटी की ग्रोथ हैबिट को देखते हुए सबसे बड़ा लाभ उन इलाकों को होगा, जहां पर प्लांट में ग्रोथ की कमी पाई जाती है। वहां इस वैरायटी को रूट स्टॉक और सिडलिंग के जरिए कलम करने के बाद डिलिशियस किस्मों का बागीचा तैयार किया जा सकता है। साथ ही इटली की नॉन स्पर किस्म सुपर चीफ भी कामयाबी की राह पर है। इससे ऊंचाई वाले उन इलाकों के बागवान भी लाभ उठा सकेंगे, जहां अमेरिकी स्पर वैरायटी कामयाब नहीं हो रही हैं। जो बागवान ऐसी पौध को इटली से नहीं मंगवा सकते हैं, उनके लिए राहत की बात यह है कि नौणी यूनिवर्सिटी ऐसी किस्मों को अपने स्तर पर तैयार कर रही है। यही नहीं, कुछ उत्साही बागवान इटली से रेड केन, फिंगल गाला, डिकारले गाला और हैपके जैसी किस्मों को भी खरीदने की जुगत में है। उम्मीद की जा रही है कि इस साल के अंत में यानी दिसंबर 2016 में यह किस्में भी हिमाचल की धरती पर लग जाएंगी।

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