रूट रॉट की समस्या

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रूट रॉट रोग से ग्रस्त पौधों की पत्तियां आकार में छोटी और पीली पडक़र समय से पहले ही झड़ जाती है। अगस्त-सितम्बर माह के बीच पत्तियों में पीलापन आने पर आता है मुरझा जाती हैं। प्रभावित पौधें की शाखाओं में नई वृद्घि कम होने के साथ सुखने लगती हैं। इस रोग के लक्षण जड़ों पर अधिक स्पष्ट दिखाई देते हैं जो रोग की सही पहचान करवाते है। जड़ों सड़ान से पौधे को भूमि से पोषक तत्व नहीं मिलते और वे मर जाता है लेने में असमर्थ हो जाती हैं जंगलों के पास लगे बागीचों में यह रोग अधिक पाया गया है।
रासायनिक उपाय
पौधे में रोग के लक्षण दिखाई देते तो ऐसे पौधों की जड़ो को सर्दियों में कुछ दिनों के लिए खुला रखें। ब्लो लैम्प हो तो जड़ों के धीमे आंच पर रोगी भाग जला दें । ऐसे करना संभव न हो तो रोगी जड़ों को काट कर चोबाटिया पेंट लगाएं। याद रखे सर्दियों में इस काम को अगर आप कर रहें हैं तो पौधे को सहारा हुए जरूर दे क्योंकि अधिक बर्फ ओर बारिश से पौध गिर सकता है। रोग ग्रस्त पौधों में जून-जूलाई या बरसात के आरम्भ होने से पहले कारबैंडाजिम (100 ग्राम प्रति 100 लीटर पानी) या ओरियोफंजीन नामक फफंूदनाशक दवाईयों का घोल डालें। यह घोल पौधे के तौलिए में 30 सेंटीमीटर की दूरी पर झब्बल द्वारा छेद बनाकर 15-20 दिन के अन्तराल में 2-3 बार डालें।

जैविक उपाय
1 एन्टैरोबैक्टर एरोजन्स,बैसीलिस सबटीलिस व सूडोमोना फ्लोरिसैंस जेसे जीवाणु इस रोग को कम करने में प्रभावशाली पाए गए हैं। ट्राइकोडरमा फफूंद की कुछ प्रजातियां,जैेेसे
हीमैटम, वाइरान्स,लोगीब्रेकेटम,हरजियानम भी इस रोग के नियन्त्रण में उपयोग पाई गई हैं।
2 मुलवृन्त जैसे एम.एम.-104,एम.एम.-111 मैलम परूनिफोलिया व मैलस फलोरीबन्डा इस रोंग के लिए प्रतिरोधी हैं।
3 नीम की खली,देवदार की पत्तियां, पंजफूली (लैन्टाना ) व बाणा (वाईटैकस) के पत्तों का तौलियों में प्रयोग भी रोग को कम करने मे उपयोग है।
4 सेब के पौधें के तौलियों में बंद गोभी के पत्ते व तारा-मीरा की मलचिंग करने से भी रोग कम होता है।

5 रोगी पौधों के तौलिये में सेब की सीडलिंग (पाला या पालटी ) या प्रतिरोधी मूलवृन्त के पोधे लगाकर उन्हें रोगी पौधे के तने में एपरोच ग्राफ्ट कर के पोषक तत्वों की कमी पूरा करके उनकी आयु बढ़ा सकते हैं।

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