मिट्टी से जन्मे ये रोग

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सेब के पौधों को कई प्रकार के मृदा जनित रोग हानि पहुंचाते है। इनमें जड़ विगलन और तनामूलसङ्क्षध विगलन रोग मुख्य हैं, जबकि अन्य रोगों में पौध का झुलसा रोग व हेयरी रूट है।
हालङ्क्षक यह कम पाए जाते हैं। ये रोग विश्व के सभी उत्पादक देशों में देखे गए हैं। भारत मे ये रोग सेब उत्पादन वाले राज्यों जैसे हिमाचल प्रदेश, जम्मू व कश्मीर, उत्तराखण्ड व पूर्वी भारत के पहाड़ी क्षेत्रों में विद्यमान हैं। हिमाचल में भी ये रोग लगभग सेब के सभी बागीचों में पाए गए है। ये रोग नर्सरी पौधों से लेकर किसी भी अवस्था े पौधों की जड़ों में पाए जाते हैं। यह रोग पौधे को बुरी तरह प्रभावित करते है और उत्पादन में कमी का मुख्य कारण बन गए है।
जड़ विगलन रोग
इस रोग से संक्रमित पौधों की पत्तियां आकार में छोटी व पीली पडक़र असमय ही झड़ जाती है। प्राय: अगस्त-सितम्बर माह के बीच पत्तियों में पीलापन आता है और यह मुरझा जाती है। प्रभावित पौधों की शाखाओं में नई वृद्धि मंद हो जाती है और वे सूखने भी लगती हैं। रोग ग्रस्त पौधों में फल कम व छोटे आकार के लगते है। इस रोग के लक्षण विशेषकर जड़ों पर अधिक स्पष्ट दिखाई देते हैं व रोग की सही पहचान में सहायक हैं। रोगग्रस्त जड़ों की सतह पर बरसात के मौसम में प्राय: कवक का सफेद रोएंदार जाला बन जाता है जोकि जड़ की बाहरी त्वचा हटाने से देखा जा सकता है। जड़ो क सडऩे से वे भूमि से पोषक तत्व लेने में असमर्थ हो जाती हैं व रोगी पौधा दुर्बल होकर 1-3 वर्षो में मर जाता है। कभी-कभी ऐसे पौधे तेज हवा चलने से भी उखड़ जाता है। जंगलों के पास वाले बागीचों में यह रोग अधिक पाया जाता है, क्योंकि इस रोग का कवक जंगली पौधों जैसे देवदार, चीड़, कैल, बान आदि प्रजातियों को भी प्रभावित करता है।
रासासनिक उपाय
बागीचों में रोग के लक्षण दिखाई देते ही ऐसे पौधों को निशान लगा लें व सर्दियों में ऐसे पौधों की जड़ों को कुछ दिनों के लिए खुला रखें। बलो लैम्प की मदद से रोगी भाग को सेक देकर जला दें या फिर काट कर चोबाटिया पेस्ट लगाएं।
रोग ग्रस्त पौधो में जून-जूलाई या बरसात के आरम्भ होने से पहले कारबैंडाजिम 100 ग्राम प्रति 100 लीटर पानी या ओररयोफंजीन नामक फफूंदनाशक दवाईयों का घोल डालें। यह घोल पौधे के तौलिए में 30 सेंटीमीटर की दूरी पर झब्बल द्वारा छेद बनाकर 15-20 दिन के अन्तराल में 2-3 बार डालें।

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