पलम की मांग भारत की मण्ड़ीयों में बढ़ती जा रही है

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फलों में पलम का एक वि”ो’ा स्थान है। इसकी खेती गर्म घाटियों में तथा मध्यम पहाडों में सफलतापूर्वक की जा सकती है। पलम की मांग भारत की मण्ड़ीयों में बढ़ती जा रही है। पलम के फल देखने में खूबसुरत व खाने में स्वाद होते है। इसके फलों से हमें तत्व विआमिन प्रोटीन, वसा व कार्बेहाईड्रेटस अधिक मात्रा में मिलते है।
जलवायुःपलम इसको सर्दियों में ठण्ड की आव”यकता होती है पलम की किस्में मुख्य रूप से दो प्रकार की होती है। यूरोपीयन व जापानी यूरोपीयन पलम को 800 से 1000 तक ठण्ड के घण्टे तथा जापानी किस्मों 700 से 1000 ठण्ड के घण्टे चाहिए होते है। इसकी खेती मुख्य रूप से प्रदे”ा की गर्म घाटियों तथा मध्यम पहाडि़यों पर की जाती है जहां गर्मीयों में मौसम गर्म तथा सुखा रहता है। इसकी खेती प्रदे”ा के 1000 मीटर से 1600 मीटर तक व्यवसायिक तौर पर की जा सकती है। फूल खिलने के समय ठण्ड, वर्’ाा व ओला वृ’िट व पाला नहीं पड़ना चाहिए अन्यथा फसल को क्षति पहुंचती है।
मिट्टीःपलम को गहरी उपजाऊ, दोमट एवंम अच्छे जल निकास वाली मिट्टी की आव”यकता होती है। बरसात के दिनों में पानी खड़ा नहीं रहना चाहिए नही ंतो जड़े सड़ जाती है। का प्रसारण साधारणतयः च”मा या कल्म बांधकर किया जाता है। इसके लिए जंगली खुमानी के बीजू पौधों को मूलवृंत के रूप में प्रयोग किया जाता ह ै। कलिकायन की टी िवधि मई से सितम्बर तक एवं जिव्ह्म कल्म फरवरी-मार्च में बांधकर पौधे बनाए जाते हैं। एक वर्’ा के बाद पौधे दिसम्बर-जनवरी में पौधों को उखाड़कर बागीचों में लगाया जाता है।
किस्मेंः
चार पलम की प्रजातियों को लगाने की सिफारि”ा की जाती है।

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1. रैड ब्यूटः फल मध्यम आकार के ग्लोब की तरह लाल एवं चमकीली त्वचा वाले, गूदा लाल, पिघलने वाला, मीठा एवं सुगंधित व गुठली चिपकी रहने की प्रवृति वाला सैटांरोजा से दो सप्ताह पहले पक कर तैयार, पौधे ओजस्वी, मध्यम आकार के एवं निमित फल धारण करने वाले होते है।

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2. सैटां रोजाः इस किस्म के फल बड़े एवम बैंगनी रंग के होते हैं। फलों में “ार्करा की मात्रा अधिक होती है तथा ये बड़े स्वादि’ट होते ह ैं। फलों में गुलाब जैसी गन्ध होती है फलतः नियमित तथा अधिक होती है। फल जून के द्वितीय सप्ताह से तृतीय सप्ताह तक पकते हैं।

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3. फ्रटियरः फल सैटारोजा से भारी और आकार में बड़ा, छिल्का गहरा लाल बैंगनी, गूदा गहरे लाल रंग का, मीठा, स्वादि’ट, सख्त, एकसा मीठा, सुगंधित व गुठली से अलग होने वाला फल भण्डारण की अधिक क्षमता तथा जून के अन्तिम सप्ताह (सैंटारोजा से 10-12 दिन बाद) पककर तैयार पैदावार अधिक पौधा ओजस्वी सीधा उपर की ओर बढ़ने वाला अधिक फलन के लिए परपरागण की आव”यकता इसके लिए सैंटारोजा अच्छी किस्म है।

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4. मैरीपोजाः इस किस्म के फल फ्रटियर से भी आकार व भार में बड़े होते हैं। फलों की आकृति हृदयकार होती है। फलों का रंग हल्का हरा तथा फलों पर छोटे-छोटे चिते होते हैं। फल बड़े स्वादि’ट होते हैं तथा गूदे कारंग तरबूज जैसा होता है। गुठली गूदे से जल्दी अलग हो जाती है। फल जुलाई के तृतीय सप्ताह में पकते हैं। पौधा ओजस्वी सीधा ऊपर की ओर बढ़ने वाला अधिक पैदावार के लिए परागण की आव”यकता हेाती है। इसके लिए सैटारोजा अच्छी परागण किस्म हैं।

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