नाशपाती पर भी ध्यान दें, सेब से महंगी बिकती है साहब

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द आर्चर्ड ब्लूम डॉट कॉम ब्यूरो
नाशपाती का उत्पादन हिमाचल प्रदेश में तेजी से अपना स्थान बना रहा है। अभी नाशपाती के उत्पादन को लेकर हिमाचल में बागवान अधिक जागरुक नहीं है। यही नहीं, इसकी ओर बागवान खास ध्यान भी नहीं दे रहे हैं। सेब के साथ-साथ नाशपाती के उत्पादन से भी बागवान अधिक आय अर्जित कर सकते हैं। पिछला रिकार्ड देखा जाए तो काफी समय से बागवान सेब से अधिक दाम नाशपाती के पा रहे हैं। ऐसे में नाशपाती की ओर भी पर्याप्त ध्यान देना जरूरी है। बागवानों को नाशपाती के प्रति अपना नजरिया बदलने की आवश्यकता है। जितना ख्याल सेब के पौधों का रखा जाता है, उतना ही नाशपाती के पौधों का भी रखना जरूरी है।
नाशपाती उत्पादन में पौधे की सही ग्रोथ के लिए प्रूनिंग का महत्व है। इसके अलावा पौधों का गोबर की खाद से उचित उपचार भी उतना ही जरूरी है। इन दोनों की तरफ बागवान अधिक ध्यान नहीं देते हैं। नाशपाती के पौधों में गोबर की खाद अमृत की तरह काम करता है। इसके पौधों में रसायनों का अधिक प्रयोग नहीं करना चाहिए। इसके पौधे रसायनों के प्रति अधिक ग्रहणशील नहीं हैं। नाशपाती प्राकृतिक तौर पर अपनी ग्रोथ खुद निर्धारित करता है। ऐसे में इसकी ग्रोथ के लिए तरीके भी प्राकृतिक ही अपनाए जाने चाहिए।
हिमाचल में कुछ प्रगतिशील बागवान रूट स्टॉक पर काम कर रहे हैं। बागीचों की मेड़ पर इसके पौधे लगाए गए हैं। विदेशी किस्मों को भी उगाया जा रहा है। यदि नाशपाती के उत्पादन का जिक्र किया जाए तो कोटखाई के ढांगवी इलाके के बागवानों ने सेब के साथ-साथ नाशपाती उत्पादन पर भी गौर किया है। इसका लाभ यह हुआ कि उन्हें दोहरी आय हो रही है। नाशपाती के दाम सेब से अच्छे मिलते हैं। हिमाचल में नाशपाती की विभिन्न किस्मों की खूब संभावना है। देश में नाशपाती की बहुत मांग है। ग्रीन नाशपाती की मांग अधिक है। ग्रीन नाशपाती की किस्मों में अपाटे फैटल, पैखम व कॉनकार्ड शामिल है। पहाड़ की तूंबा नाशपाती भी बेहतर है। यह पिछले पांच साल से मार्केट में खूब पसंद की जा रही है। जिस नाशपाती की शैल्फ लाइफ अधिक हो, वही मार्केट में टिकेगी। हिमाचल के बागवानों को इन पहलुओं की तरफ ध्यान देगा।

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