चिप बडिंग जून-जुलाई में

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हिमाचल प्रदेश में अस्सी फीसदी बागीचे सेब की रॉयल किस्म के हैं। यह जमाना रॉयल की बजाय स्पर किस्मों का है। रॉयल के बागीचों को स्पर में बदलने के लिए ग्राफ्टिंग की तकनीक की जानकारी होना जरूरी है। सेब में ग्राफ्टिंग मुख्य रूप से तीन तरीकों से की जाती है। इनमें चिप बडिंग, टंग ग्राफ्टिंग व बैंच ग्राफ्टिंग शामिल है। टंग ग्राफ्टिंग मार्च-अप्रैल में, चिप बडिंग जून-जुलाई में और बैंच ग्राफ्टिंग के जरिए पौधशाला में ही पौधों को ग्राफ्ट कर बाद में बागीचे में लगाया जाता है। हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड व कश्मीर में मुख्य तौर पर टंग ग्राफ्टिंग ही प्रचलित है। विदेशों में चिप बडिंग तकनीक अधिक प्रयोग में लाई जाती है। हिमाचल में भी कई बागवान इस तकनीक को अपना रहे हैं। इसका कारण यह है कि चिप वडिंग विधि से एक कलम में कई बड निकल आते हैं। टंग ग्राफ्टिंग में अधिक कलमें खर्च होती हैं। चिप बडिंग से कई पौधे तैयार होते हैं। अनुमान है कि चिप बडिंग के मुकाबले टंग ग्राफ्टिंग में पांच गुना अधिक कलम खर्च होती है। चिप बडिंग से तैयार पौधों में संक्रमण के आसार भी न के बराबर होते हैं। टंग ग्राफ्टिंग में संक्रमण का खतरा अधिक रहता है।

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