कैंकर की समस्या व समाधान

0
1091

विश्व में जहां पर भी सेब उत्पादन हो रहा है, वहां कैंकर ने अपना हमला किया है। हिमाचल प्रदेश के बागीचे भी इससे अछूते नहीं रहे। कैंकर का रोग सेब के पौधे के लिए कैंसर की तरह घातक साबित होता है। पौधे के तने, शाखा या टहनी पर धंसी हुई छाल तथा अंदर की लकड़ी के प्रभावित हुए भाग को कैंकर कहते हैं। हिमाचल प्रदेश में सेब के बागीचों में पंद्रह प्रकार के कैंकर पाए गए हैं। यह रोग नौ सौ से बारह सौ मीटर की ऊंचाई वाले बागीचों को अधिक प्रभावित करता है। इससे ऊपर के इलाकों में इसकी मार कम पड़ती है।
कैंकर घाव का आकार बड़ा या छोटा हो सकता है। यह घाव लकड़ी के भीतरी भाग को संक्रमित कर सकता है या फिर छाल के उपरी भाग तक ही सीमित रहता है। इससे पौधों की छाल नष्ट हो जाती है। कैंकर से प्रभावित पौधे का यदि समय पर उपचार न किया जाए तो यह काफी नुकसान पहुंचाता है।
पौधों में घाव होना, जरूरत से अधिक वनस्पति उगना, कांट-छांट अच्छी तरह से न होना, टहनियों को घाव लगने से, धूप के तीखेपन आदि से कैंकर पैदा होता है। बगीचों में बैलों से जुताई करने से पौधों में रगड़ लग जाती है। यह भी ध्यान रखना चाहिए कि तौलियों में खाद-उर्वरक डालते समय तने के मूल तक खुदाई न करें। इससे पौधों में घाव बन जाने से रोगाणु प्रवेश कर जाते हैं।
ढलान की अपेक्षा रोपा क्षेत्रों के बगीचों में इन रोगों की अधिकता है। इसका मुख्य कारण पानी की उचित निकासी न होना व गोबर खाद का प्रयोग न करने से मिट्टी का सख्त रह जाना हो सकता है।

LEAVE A REPLY